हमारे हिन्दू धर्म में भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और बड़े ही भक्ति भाव से प्रभु के बाल गोपाल स्वरुप को सजाया संवारा जाता है. इस दिवस पर ऐसा लगता है जैसे समस्त देश वृंदावन बन गया हो और कृष्ण लहर प्रवाहित होकर आनंद बरसा रही हो.

इस उत्सव पर देशभर में मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है और प्रभु श्री कृष्ण की लीलाओं को झांकी के माध्यम से दर्शाया जाता है. इन सभी धार्मिक क्रियाकलापों से हम सभी को तो भक्ति का बोध होता ही है, साथ ही हमारे बच्चों को भी अपनी युगों प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है.

द्वापरयुग में धरती से अधर्म को दूर करने के उद्देश्य से भगवान श्री विष्णु ने अपने सबसे शक्तिशाली अवतार कृष्ण के रूप में देवकी और वासुदेव के पुत्र बनकर जन्म किया.

यह वह समय था, जब पृथ्वी पर कंस नामक दुराचारी शासक का आतंक फैला हुआ था और अपने अनाचारी स्वाभाव से वह धर्म को पृथ्वी से समाप्त करने पर तुला हुआ था. ऐसे में जब यह भविष्यवाणी उसके कानों में पड़ी कि उसकी ही प्रिय बहन देवकी की आठवीं संतान कंस का काल बनेगी, तो अपनी मृत्यु के भय से उसने अपनी नवविवाहित बहन और उसके पति वासुदेव को कालकोठरी में डाल दिया.

कंस जो अपने शक्तिशाली होने के घमंड से चूर था और चाहता था कि धरती पर केवल और केवल उसे ही पूजा जाये, अपनी मृत्यु की बात सुनते ही घबरा गया और अपने अत्याचारों की गति बढ़ाते हुए उसने एक एक कर देवकी की सातों संतानों को पत्थर की शिला पर पटक कर मार डाला.

जब देवकी और वासुदेव की गोद में उनकी आठवीं सन्तान के रूप में भगवान श्री कृष्ण आए तो ईश्वरीय आज्ञा से वासुदेव अपने नवजात पुत्र को गोकुल में अपने मित्र नंद के घर चुपचाप पहुंचा दिया और किसी को इसकी कानोंकान भनक नही हो इसलिए नंदबाबा और यशोदा के घर जन्मी बालिका को अपने साथ ले आए. जहां कंस ने उस बालिका को भी मरने का प्रयास किया किन्तु वह बालिका योगमाया थी, जिसने देवीय रूप धारण कर कंस को चेतावनी दी कि तेरे मरने वाला तो गोकुल में पैदा हो चुका है.

इसके उपरांत से बाल गोपाल की मधुर लीलाएं बृज भूमि पर आरम्भ हुई और उन्होंने माखन चोरी, वस्त्रहरण, कालिया मर्दन, गिरिराज धरण जैसी तमाम लीलाएं की. साथ ही उन्होंने कंस के भेजे हुए सभी राक्षसों को भी समाप्त कर बृजवासियों की रक्षा की. बड़े होकर भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा जाकर कंस का वध किया और धरती को अन्याय से मुक्त कराया.

भगवान श्री कृष्ण के इस संकटहरण स्वाभाव के कारण ही आज तक भी न केवल उन्हें श्रृद्धाभाव से पूजा जाता है, अपितु उनके दिखाए मार्ग पर प्रशस्त होकर अनेकों जन आत्म शांति का भी बोध करते हैं.

अत: जन्माष्टमी के इस पावन पर्व पर आप सबके जीवन में खुशहाली, शांति और सौहार्द का सम्मिश्रण हो. आप सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

स्नेहशील अभिनंदन

रामजी त्रिपाठी

गौ, गंगा, गरीब संरक्षक

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